खून है जो खोलता
जमीर है जो बोलता
हाथों में हथियार नहीं
शब्दों से ही बोलता
सुनते हैं ये आज हम
जो ना किसीने है सुना
किसी ने फिर से है किया
आत्मा को अधमरा
सुनते ही बातें उसकी
साँसे हैं जो थम गयीं
बिजली ऐसे है गिरी
आग तन में लग गयी
विचलित हो ये मन मेरा
पूछता है मुझसे अब
आम हो गया है ये
दुनिया का कुछ ऐसा ढंग
कभी तो राम राज था
कभी अहिंसा का ठिठोलापन
कभी कहीं पे जंग थी
यहीं देखा दंगो का रंग
देखें थे ये सपने
जिसने भारत-ऐ-आजाद के
देखतें हैं वो आज जब
सीना उनका है फटा
हाथों में हथियार नहीं
इसलिए शब्दों से ही बोलता
खून है जो खोलता
जमीर है जो बोलता...
